मुक्तक

लग रहा है पेट -भूखा , कुलबुलाहट हो रही है |
चल रहा है कोई कीड़ा , सुरसुराहट हो रही है |
जब अनाचारी , दुराचारी , सब गये हों मिल ,,
पंकज नये संकट की अब सुगबुगाहट हो रही है |
जल गया है अंग कोई , छरछराहट हो रही है |
गिर गया क्षार कोई , लिवलिवाहट हो रही है |
लग रहा तूफ़ान कोई , अब यहाँ है आ रहा ,,
व्योम में पंकज तभी यह गड़गड़ाहट हो रही है |
मीठा कहीं है गिर गया चिपचिपाहट हो रही है |
फल कोई है सड़ गया , लसलसाहट हो रही है |
लग रहा षड़यंत्र कोई रच रहा है अब नया ,
दामिनी नाराज दिखती कड़कड़ाहट हो रही है |
हो गया रक्त दूषित , चुनचुनाहट हो रही है |
हो गया बेचैन मन है , चुलबुलाहट हो रही है |
मजबूर अपनी आदतों से वे क्यों सुधारें आप को ,
बन्द कमरों में अब पंकज फुसफुसाहट हो रही है |
आदेश कुमार पंकज

2 Comments

  1. davendra87 davendra87 29/11/2015
  2. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 30/11/2015

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