जब – जब खिलता है पलाश !

जब – जब खिलता है
पलाश !
मुझे बना देता है
एक जिन्दा लाश !
जैसे
वह मुझ पर हँसता हो ,
और
वह मुझसे कहता हो ,
कि –
तुम क्यों लग रहे हो ,
इतने हताश !
तुम क्यों हो रहे हो ,
इतने निराश !
जानते हो ,
भाग्य कि अर्थी ,
कर्म के कन्धों पर
उठायी जाती है |
सच और ईमान के सहारे ,
श्मशान तक ,
पहुँचायी जाती है ,
और –
फूंक दी जाती है |
भाग्य कि लाश !
इतने पर भी ,
मनुष्य को
कहाँ होता है संतोष |
और
कर देता है चूर – चूर ,
भाग्य का सर्व नाश |
जब – जब खिलता है ,
पलाश !
मुझे बना देता ,
एक जिन्दा लाश !
याद रखो ,
देर से ही सही
लेकिन – एक दिन
कर्म कि विजय होती है |
तभी तो
रामायण और महाभारत
की रचना होती है |
यह देख
पंकज क्या ,
देवता भी हो जाते हैं ,
उदास !
जब – जब खिलता है
पलाश !
मुझे बना देता है
एक जिन्दा लाश !
आदेश कुमार पंकज

2 Comments

  1. Sukhmangal Singh sukhmangal singh 30/11/2015
  2. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 30/11/2015

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