ग़ज़ल

मोहम्बत का इम्तहान न लो सनम |
ले सकता हूँ, तेरे लिए सौ – जनम |
कष्टों और दरदों की परवाह नहीं ,
सह सकता हूँ तेरे लिये सौ जखम |
सारा जग कुछ कहे वह कहता रहे ,
बे -करारी तुम्हारी न होती हजम |
सदा ही लिखूँगा , मैं गुणगान तेरा ,
सलामत रहेगी , जब तक कलम |
कभी धोखा न दूँगा विश्वास को मैं ,
खाकर मैं कहता हूँ ,सर की कसम |
गुस्से में निर्णय , कभी भी न लो ,
जलता है मुँह उसका, खाये गरम |
सख्त लगता हूँ तुमको ऊपर से मैं ,
पर दिल से सदा ही , मैं हूँ नरम |
आप कहते कि जग में सब एक होते ,
यह सच नहीं हैं , यह है कोरा भरम |
प्यार होता है पावन यह मुझको पता ,
पंकज – निभाऊँगा , अपना – धरम |
आदेश कुमार पंकज

3 Comments

  1. Sukhmangal Singh sukhmangal singh 30/11/2015
  2. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 30/11/2015
  3. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 30/11/2015

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