|| गुलामी के दिन ||

“गुलाम बने थे एक दिन हम सब
दिन गुलामी के वो अच्छे थे
ना मजहब की ईर्ष्या थी मन में
ना हम विचारो के कच्चे थे ,

ना गम होता थे मरने का
ना उम्मीद कोई थी जीने की
हर दिल में बसती थी माँ भारती
होती थी हसरत उसी पे मिटने की ,

ना राजनीती चलती थी कोई
समाज को टुकड़ों में करने वाली
ना असहिस्णुता कही पे दिखती थी
मन को कलुषित करने वाली ,

बहती थी धर्मों की निर्मल गंगा
इंसानियत को जिन्दा रखने की
दिल में होती थी भक्ति भावना
देश को जोडके रखने की ,

मजहब आड़े नहीं आता था
कभी देशहित के भावों में
होती थी खुशबु देशभक्ति की
फैली सभी फिजाओं में ,

क्रांति की आग जलती थी दिल में
हिन्दू-मुस्लिम सबके मन में
क्यूँ टूटी भाईचारे की वो डोर
नफरत क्यूँ बोया हमने मन में ,

हुए है आज़ाद अंग्रेजो से हम
पर है गुलाम अभी-भी उन नीतियों के
था जहाँ कल तक गोरो का राज
बसते है अब वही दिल अपनों के ||”

5 Comments

  1. asma khan asma khan 27/11/2015
  2. omendra.shukla omendra.shukla 27/11/2015
  3. Hitesh Kumar Sharma Hitesh Kumar Sharma 27/11/2015
  4. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 27/11/2015
  5. omendra.shukla omendra.shukla 28/11/2015

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