||प्यार की आशा||

“महका करते थे गुलसन में
जो फूल कभी अरमानों के
रूठे है वो आज खुदी
तेरे नापाक बयानों से ,

टुटा है हर जर्रा अब तो
तेरे इश्क की दीवारों का
बुझ गयी है प्रेम ज्योति अब
तेरे कातिल उन मुस्कानों का ,

ढलती नहीं है अब शाम वहाँ
ना होती है फिर सुबह नयी
है वीरान पड़ा वो साहिल अब भी
जहाँ तू मिलने आती थी कभी ,

पतझड़ ही अब शेष रहा है
जीवन के सतरंगी बसंतों में
ना उम्मीद कोई है अपनेपन की
विदीर्ण हुए इन हृदयों में ,

है तैयार निगाहे फिर भी
होने को बोझिल सपनों से तेरे
लेती है अंगड़ाई मस्त पवन भी
हो बेसुध प्यार के ग़मों से तेरे ||”

2 Comments

  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 27/11/2015
  2. omendra.shukla omendra.shukla 28/11/2015

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