“किश्त “

अपने उसूलो पे ज़िन्दगी बसर कर ,
इन सामाजिक रीतियों में तेरी मासूमियत घट न जाए ,
अपनाना आसान होता है बुराइओं को सभी ,
कही ज़िन्दगी के किस्सों में इंसानियत की किश्त कम न पड़ जाए ||

अपनों के बीच मुस्कान बाँट लो ,
मुश्किल हालात सिर्फ तन्हाई मे न कट जाए ,
मिलने के लिए मौको की तलाश न करो ,
कही ज़िंदगी के रिश्तो में वक़्त की किश्त कम न पड़ जाए ||

हार जाओ खुदको किसी की खातिर ,
अपने अभिमान से कही एक आशियाना बिखर न जाए ,
वफ़ा से ही तो ज़िन्दगी खूबसूरत बनती है ,
कही मोहब्बत के सफर में वादो की किश्त कम न पड़ जाए ||

आँखों ने देखे है अरमान हज़ारो ,
ये सिर्फ रात के सपनो में न सिमट के रह जाए ,
लड़ रहा हु हर प्रतिकूलता से मैं यहाँ ,
कही मंज़िल के रास्तो में हिम्मत की किश्त कम न पड़ जाए ||

3 Comments

  1. asma khan asma khan 26/11/2015
    • virendra mehta 27/11/2015
  2. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 27/11/2015

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