मुक्तक । सम्मान के प्रति।

मुक्तक। सम्मान के प्रति ।

घूँट अपमानों की पीता जी रहा इंसान है ।
दम्भ, घृणा, ईर्ष्या है, खोखला अभिमान है ।
देखकर गहरी परत ये मान पर अपमान की ,
बैठ कोने में कहीँ अब रो रहा सम्मान है ।।

@राम केश मिश्र

One Response

  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 26/11/2015

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