ग़ज़ल । जलाना तो पड़ेगा ही ।

।ग़ज़ल। जलाना तो पड़ेगा ही ।।

लिखा तकदीर ने बरबस बिताना तो पड़ेगा ही ।
गमो का लुफ़्त जीवन में उठाना तो पड़ेगा ही ।

भले मरहम लगाकर ये दुनिया हौसला दे दे ।।
अग़र है जख़्म गहरा तो छुपाना तो पड़ेगा ही ।

नही नाराज़गी खुद से शिक़ायत है नही गम से ।
रहे नारज फिर भी ख़ुश दिखाना तो पड़ेगा ही ।

मिला जो इश्क़ में हमसे वही क़ातिल मेरा ठहरा ।
मग़र वादों का है बन्धन निभाना तो पड़ेगा ही ।।

मिलेगी हार मालुम है किसी शाजिस से ही मुझको ।
मग़र दिल की तमन्ना है जलाना तो पड़ेगा ही ।

बिखर कर टूट जाये दिल शिकायत से मिलेगा क्या ।
छुपाकर अश्क़ आँखों में मुस्कुराना तो पड़ेगा ही ।।

“रकमिश”सोच लेना तुम मिलेगी उम्र न फिर से ।
मिली ये जिंदगी -दौलत लुटाना तो पड़ेगा ही ।।

@राम केश मिश्र

2 Comments

  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 26/11/2015
  2. asma khan asma khan 26/11/2015

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