||सहिष्णु भारत ||

“जिस मिट्टी में उपजे हम
जिस हवा में ली है सांसे
कहके इनको असहिष्णु आज
करते है ये फालतू की बातें,

दिया है सम्मान जो इस भूमि ने
है कीर्ति के परचम को तुम्हारे लहराया
करके राग-द्वेष की बातें तुमने
जन-मानस को इसके है बहकाया ,

क्यों भूले बलिदानो को तुम
सरहद पे लड़ते जवानो के
याद ना आयी क्यूँ तुमको
उजड़ते घर जवानों के ,

मिलती है सहज ही रोटी तुमको
मिलते जीवन के सब सुख-साधन
फिर भी क्यूँ अकुलाते हो तुम
क्यूँ लगता नहीं तुम्हे अपनापन ,

विविधता की एकता वाला भारत
क्यूँ असहिष्णु नजर तुम्हे आता है
संजोये सदियों से सभ्यताओं को अपने
क्यूँ आज असभ्य नजर आता है ||”

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