“भुला-भटका दर्द “

“भुला-भटका वो दर्द कहीं
सामने आँखों के आ जाता है
दूर रहा अब तक दिल जिससे
लम्हा नजर वो आ जाता है ,

बसती है तन्हाई की दुनिया
दर्द -ए दिल के किसी कोने में
ना छलकते है अब आँखों से
आंसू जी भरके रोने में ,

तनहा-तनहा सा लगता है
अब तो जर्रा-जर्रा महफ़िल का
सुनी-सुनी सी हुई है गलियाँ सभी
है मोहताज अब भी उनके कदमो का ||”

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