कुछ भी न था

कुछ भी न था

आंचल रहता था तर-बतर
दुर्लभ अब वो आंचल हुआ,
रहता था जिसकी छांव में
मेरे साथ कुछ भी न था
जो देखा पिछे मुड़के।
बहन सरूपी वो संस्कृति
भाई सरूपी वो आदर्ष
पृथ्वी रूपी माता पिता
प्रिये शीतलता पथ-प्रदर्षक
प्यारे सदस्य घर के सारे
बस पिछे छुटे हैं मेरे
मेरे साथ कुछ भी न था
जो देखा पिछे मुड़के।
माना इस चमक-दमक में
मैं इतना क्यों खो गया
बदसूरत को जानकर सुन्दर
क्यों पिछे लग लिया हूं मैं
अब रंग कर क्यों इसके रंग में
क्यों रोता चिल्लाता हूं मैं,
मेरे साथ कुछ भी न था
जो देखा पिछे मुड़के।
भुला सारी राहें घर की
इस जंगल बियाबां में आके
न जाने वो सुन्दर स्त्री भी
कहां गई मुझे यहां बिठाके
अब रोऊं या चुप हो जाऊं
घर की यादें कैसे भुला के।
मेरे साथ कुछ भी न था
जो देखा पिछे मुड़के।
-ः0ः-

Leave a Reply