||राजनीती,मीडिया और प्रजा ||

“बेजान परिंदे है हम इस जग के
ना श्वेत गगन में उड़ना चाहे
है कलुषित विचार हमारे
ना रंग कभी ये बदलना चाहे ,

है विचारो के धनी अभी -भी
पर कुंठा से भरी पड़ी है
रक्त प्रवाह है रगो में अभी भी
पर शिथिलता से भरी पड़ी है ,

ना विवेक कहीं अपना चलता है
ना सत्य की छाया हम पे पड़ती है
बँटे हुए है हम वर्गों में
ना प्रेम की ज्योति यहाँ जलती है ,

क्लेशो से भरे बुद्धिजीवियों का
अनुकरण करता यह समाज है
है सदमे में जीने को मजबूर
और द्विविधा में बंटा समाज है ,

अफवाहों का दौर नया है
पर युक्ति पुरानी है वर्षों की
करना है यहाँ राज सभी को
देके तूल निरर्थक विषयों की ,

गुलामी के है हम बादशाह आज भी
ना स्वतन्त्र कभी हम रहना जाने
भरी है रगों में रक्त दासता की
ना बंधन मुक्त ये होना जाने ,

ना शौक है नायक बनने की हममे
ना इस प्रथा को परिवर्तित करने की
मिलती है स्वतंत्रता गुलामी की जंजीरों में
ना चाह है दूर अब इससे होने की ,

छल,दम्भ,द्वेष,पाखंडो की राजनीती
है अब यह नायक हमारे
अफवाहों से भरा मीडिया दल
बने है पथ प्रदर्शक हमारे ,

है इनके ही अनुसरण में अब जीना
होके स्वतन्त्र स्वविवेकों से
है सजग प्रहरी अब ये
भारत के अस्तित्वहीन भविष्य के ||”