“विचारो की आज़ादी “

“हो विचारो की आज़ादी
ना द्वेष कभी प्रबल हो हम पे
ध्यान रखे हम मर्यादाओं का
और खुश हो हम अपने पन से ,

करे बुलंद हम खुद के दिल को
सदाकत को अपनी शक्तियों से
हो ना फिर दिग्भ्रमित कभी
झूठे प्रलोभनों से हृदयों को ,

बहे प्रेम की ऐसी धारा
चिरकालों की वेदी पर
ना हो शोषित कोई भी जन
आस्था की बलि वेदी पर ,

निर्मल बहे अमन की गंगा
मजहबी इन धरातलों पर
शांतिपरक हो हिय सबके
और जिए सच्चे आदर्शों पर ||”

4 Comments

  1. asma khan asma khan 25/11/2015
  2. omendra.shukla omendra.shukla 25/11/2015
  3. Rinki Raut Rinki Raut 25/11/2015
  4. omendra.shukla omendra.shukla 25/11/2015

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