जीवन

सुन्दर सुकोमल नारी
अश्रु लिये नयन भारी
पर्वत शिखर बलहारी
करूण क्रंदन दुखहारी।
सरित द्वार गूंजत झम
तृष्णा हुई ज्यों मध्धम
मंद कदम हुई दमदम
गूज रही छंद छमछम।
भोर का भव्य प्रार्दुभाव
रश्मिकणों का उद्भाव
क्षणिक नहीं डिगे भाव
मान शक्ति का स्वभाव।
हिम श्रृंखलाऐं स्खलित
नौकाऐं जल में ज्वलित
गर्व गंधों का खण्डित
अम्बर अगार अचम्भित।
शैशव मन चित्कार रहा
मानव मन्द डोल रहा
गर्वित द्वन्द बोल रहा
दुख मन झकझोर रहा।
आस निशा की चादर
सूर्य थामे उष्ण खादर
वैरागों का यह आदर
चंद्र उद्दीपन क्षणभर।
स्वच्छंद जल कलकल
वेग वायु संग अविरल
खगों का सार कलरव
खिले आशदीप दलबल।
नभों ने थामी सुन्दरता
वेगों में फैली आतुरता
थल की भी निश्छलता
मन परसाई कोमतला।
प्रेम की फैली अधिकाई
कणिकाऐं सार रच आई
धरा पुष्पों संग मुस्काई
सुकुमारी घर लौट आई।
हे सुन्दर सुकोमल नारी
शब्दार्थ अत्यन्त छलहारी
मन पुनित तन अंहकारी
राग संग गीत मनोहारी
जीवन पल्लवित आभारी।

…….. कमल जोशी

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