कविता ः चोट

अधिक नहीं बस याद यही ,
कुछ हे कचोटता मुझे ,
क्या हे ये भी शायद जानता ,
मगर बताना भी बस ,
बढ़ाना होगा उस कचोट को ,
या शायद बह जाना होगा उसका …..

मगर सच हे कि ,
इस घोर असमंजस में ,
मैं खुद को तडपाना ,
सजा देना चाहता हू …

कि शायद किसी तरह मेरी वह कचोट ,
मेरे मन पर बना दे ,
एक ऐसा निशां चोट का ,
कि याद रहे मुझे सदा ,
क्या था जो था कचोटता ,
क्यों था जो था कचोटता ….

नहीं मैं कोई  दार्शनिक नहीं ,
हु तो बस साधारण इंसान ,
जिसने भी की हे कई गलतियाँ,
सबकी तरह ,
जी रहा जैसे कुछ किया ही नहीं ….

इन गलतियों और चोटों का हिसाब नहीं रखा मैंने ,
मगर जब भी दी किसी और को चोट मैंने ,
तब बना लिया दिल पर खुद के
एक गहरा निशान चोट का ….

3 Comments

  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 23/11/2015
  2. anuj 24/11/2015

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