बुरा हैं देश का हाल !

हर रोज हो रही हिंसा,फसाद
दरिन्दो,गुनाहगारो ने लगा रखे हैं नकाब !
पैसो से तौले जा रहे हैं यहाँ इन्साप
हैं क्या अदालत के पास इसका जवाब !!

देश में छायी हुई हैं संकट के बादल,
गुम हो गयी हैं न्याय के किताब !
दया, प्रेम जल के हो रहें हैं राख
छल-कपट के खुले हैं दुकान आज !!

भ्रष्टाचार फैली हुई हैं महमारी की तरह,
मुश्किल कर रखा हैं जीना मंहगाई ने आज !
सरकार को आम-जनता का फिकर हिं कहा,
अपने ताज बचाने में लगे हैं दिन-रात !!

खुल्ले आम हिंसा का खेल रोज हो रही,
चोर,अपराधियों से भरे हुये हैं जेल !
आतंक का साया आज इतना बढा हैं
डर के जी रहें हैं अपने हि घर में लोग !!

आज कि मैने देश पे मंथन ,
सरकार सोये हुये हैं,जनता हैं चुप !
बुरा हैं देश का हाल किसे खबर ,
धर्म के ठेकेदारो का किसने देखा असली रूप !!

One Response

  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 22/11/2015

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