उदास …. ( मुक्तक )

उदास …. ( मुक्तक )

छत पर बैठी सांवल गोरी, लिए मन उदास,
जिंदगी नीरस लगी छोड़ी जीने की आस !
कलयुग में नर से सहती हर पल अत्याचार ,
आबरू कैसे बचे, उपाय बचा न कोई पास !!
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डी. के. निवातियाँ …………!!

2 Comments

  1. asma khan asama khan 22/11/2015
    • डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 22/11/2015

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