हाइकू । दिखे समाज ।

हाइकू । दिखे समाज ।

परम्पराएँ
गंगा नदी का तट
धोतीं है केश

ह्रदय रचे
अलौकिक दर्पण
दिखे समाज

छाये बादल
युवा करें आह्वान
बरसे ज्ञान

स्नेहो की जीत
निजता भी न खोये
सुन्दरताएं

रोता क्यों न्याय
चलो जलाएँ दीप
झूठा अन्याय

@राम केश मिश्र

One Response

  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 22/11/2015

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