मैं भौरा, काली हो तुम

निकलती किरणों से खिलती हो तुम
पवन के साथ मुसकुराती हो तुम
कल-कल करती नदियों सी गुन-गुनाती हो तुम
बारिश की बुंदों से जब नहाती हो तुम।

ऐसा लगता है जीवन हो तुम
हंसी खुसी की समंदर हो तुम
अपसरावों से न कम हो तुम
स्वर्ग से आई नई परी हो तुम।

प्रातः भोर मेरी खोज हो तुम
जीवन का सिर्फ लक्ष्य हो तुम
अंधेरी गलियों की दीप हो तुम
मैं भौरा, काली हो तुम।

मेरे बगीचो की रानी हो तुम
मैं माली, गुलाब हो तुम
मैं प्यासा, प्यास हो तुम
मैं भौरा, काली हो तुम।

-संदीप कुमार सिंह।

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