गीत-झीना-झीना प्यार का आँचल -शकुंतला तरार

गीत
झीना-झीना प्यार का आँचल
हौले जब लहराए केश |
नभ से चन्दा झाँक रहा है
आज बदलकर नटी का वेश ||
तारों की बारात सजी है
चाँद गगन पर इतराया
वादा लेकर रात मिलन की
किरनों को भी भरमाया तो
कोमल-कोमल पट सरकाकर
चाँदनी ने भी किया प्रवेश
नभ से चन्दा झाँक रहा है
आज बदलकर नटी का वेश ||
चंचल-चंचल मन प्राण हुआ
नूतन-नूतन आभास हुआ
तरू-तरू,त्रिण-त्रिण, पल-पल,कल-कल
बावरा मन परवाज़ हुआ तो
वन-पर्वत घाटी नदियों पर
धवल आवरण लगें विशेष
नभ से चन्दा झाँक रहा है
आज बदलकर नटी का वेश ||
चन्दा का मन क्यों है बावरा
क्यूँ जागे वो सारी रात
नगर-नगर वो डगर-डगर में
क्यूँ भटके वह करता प्रात
भोर किरण से मधुर मिलन को
खुद को पहुंचाता वह ठेस
नभ से चन्दा झाँक रहा है
आज बदलकर नटी का वेश ||
शकुंतला तरार रायपुर (छत्तीसगढ़)