इन्तजार

छूं तो लेता मैं गुलाब को
मगर डरता है यह दिल
कहीं मैला न हो जाये
या बिध कर उसके कांटों को
खून पीने की लत न पड़ जाये
उस गुलाब को
इसलिये दूर से देखता हूं
तन्हाई में सोचता हूं
गहराईयों में मुस्कुराते हुऐ
परछाईयों में ढूंढता हूं
और इन्तजार करता हूं
उसके मुरझा कर गिरने का।

………………… कमल जोशी

Leave a Reply