मेरा सपना

मैने गणतंत्र दिवस पर अपनी कॉलोनी में बच्चों के लिए दौड़ प्रतियोगिता का आयोजन
कुछ सालों तक किया था और निम्नलिखित कविता भी उसी मौके पर बच्चों को सुनाने
के लिये लिखी थी , मगर उन्हे कभी सुना नहीं पाई।

पेश है मेरी वह उनसुनी कविता :-

मेरा सपना

मेरा सपना जो खो गया था कहीं ,
नन्ही आँखों में फिर से देखा यहीं ,
मेरा सपना जो खो गया था कहीं ,

रहने दो तुम अपने पास युहीं ,
कि सपने देखने की मेरी उम्र नहीं ,
मेरा सपना तो अब तुम्हारा है।

मेरा सपना तो अब तुम्हारा है,
मेरा सपना जो अब तुम्हारा है,
उस एवज में मुझ से वादा करो।

देश में नाम तुम कमाओगे,
माँ बाप की शान तुम बढ़ाओगे,
चार्मवुड का चार्म बन कर छाओगे।

जैसे हम सपनों को भुला बैठे ,
तुम उन्हे भूल तो न जाओगे,
मेरा सपना जो खो गया था कहीं।

मेरा सपना जो खो गया था कहीं ,
नन्ही आँखों में फिर से देखा यहीं ,
मेरा सपना जो खो गया था कहीं।

4 Comments

  1. Bimla Dhillon 21/11/2015
    • Manjusha Manjusha 22/11/2015
  2. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 22/11/2015
    • Manjusha Manjusha 26/11/2015

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