इंसान

न भुझा पा रहा हु , न सुलगा पा रहा हु ,
मैं इंक़लाब की राख समेटे चला हु ,
खुदगर्ज़ होना बचपन मे न सीखा मैंने,
ये तो इन लोगो की देखा देखि हो गया हु ,
बनावटी बना k रख दिए है जीवन मेरा ,
हर पल खुद्की तलाश मैं चल रहा हु , ,
मै इंक़लाब की राख समेटे चला हु | |
गरीबी लाचारी बेईमानी को अपना लिए ह मैंने,
इन्साफ की तरह आँखों पे पट्टी बंधे खड़ा हु ,
आंसुओं की सच्चाई भी न समझ पाया मैं ,
अपनी ही की लाश लिए खड़ा हु ,
मैं इंक़लाब की राख समेटे चला हु ||
न आज़ादी क लिए न उसूलो के लिए ,
मैं अपनी जंग सिर्फ पैसो के लिए लड़ा हु ,
मंज़िल पे शायद पहुँच भी जाऊ कभी ,
रिश्तो को दबा के ही तो आगे बड़ा हु .
मैं इंक़लाब की राख समेटे चला हु ||

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