मक़सद

दुनिया से लड़ने की फुर्सत कहाँ है,
जब से हूँ खुद से ही लड़ रहा हूँ मै।
भीतर मेरे गुनाह का तूफ़ान है शायद कोई,
हर रोज जिसके ज़ोर से बच रहा हूँ मै।
मक़सद नहीं है जन्नतों की शान को पाना,
इंसान को पाने के लिए जी रहा हूँ मै।
……………देवेंद्र प्रताप वर्मा”विनीत”

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