तस्वीर

कागज के पन्नों पर
मानचित्र की रेखाओं ने
खींची लकीरें सीमाओं की
बांट रही जल भूतल
रोक न सकी उड़ान हवाओं की
पतंगों का सफर
डोर के साथ बढ़ता रहा
उड़ते परिन्दों का शोर भी
गूंजा सरहद की ऊंचाईयों में
कश्ती जो सजायी थी बचपन में
उसको भी सुदूर कहीं
मिल गई मंजिल गहराईयों में
सूरज की किरणें फैली
चहुंओर दिशाओं में
चांदनी भी न रूक सकी
मधुर निशा की परछाईयों में
अद्भुत घटनाक्रम
संकेतक कहां मिलों का पत्थर
मानव राह हुई तत्पर
जीवन के पथरीले पथ पर
अनदेखी उथल पुथल
अकल्पित राहों का चक्र
उस पार जांऊ किस रथ पर
मैं से मानवता का रिश्ता
छूट रहा अभिमानों में
लालसा बनी अराजकता
संस्कारों को खोज रहा वीरानों में
विकल्पों के हृदय बने
विस्मयकारी अभिमानों में
चित्कार रहा
मन परिवर्तन का हिस्सा
खो कर इतिहासों का किस्सा
विस्मृत सार किया अधिकारों ने
तस्वीर सजाई कैसी इन्सानों ने।

………………… कमल जोशी

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