असलियत

ना बिस्तर के किनारे में ना अकेले करहाने में ,
मुझे तो बस नींद मिली मेरी माँ के सिरहाने में ||

ना वक़्त को हराने में ना अलग पहचान ज़माने में ,
मुझे तो ख़ुशी मिली बस अपने दोस्त को हँसाने में ||

ना ज़ख्म के आने में ना ज़िंदगी को निभाने में ,
मुझे तो दर्द हुआ सिर्फ अपने प्यार को भुलाने में ||

ना ज़िम्मेदारी निभाने में ना भोज को उठाने में ,
मेरी असली मेहनत एक रोटी को कमाने में ||

One Response

  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 20/11/2015

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