“एक छोटी नदी “

हिम से निकली एक आज़ाद परी ,
यु तो नटखट पर स्वाभाव में खरी ,
रास्ता अनजान न आँखों में मंज़िल,
बह निकली वह छोटी नदी ||

हर पत्थर हर वृक्ष को पार कर ,
अपने रास्ते के हर दृश्य को सवाँर कर ,
जोश खूब उसे अपनी जवानी का ,
उसके बहाव में कोई न तैरता था डर कर ||

वक़्त बड़ा वह आगे चली ,
न वो जोश न वेग बची ,
लोगो ने उठाया लाचारी का फायदा ,
नदी को भी बुढ़ापे की फिक्र लगी ||

समझ में आया की गुरूर एक बेतुका अफ़साना है ,
ज़िन्दगी तो एक खत्म होता पैमाना है ,
जितना निस्वार्थ दे सको वही साथ जाना है ,
एक दिन तो उसे भी सागर में मिल जाना है ||

One Response

  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 20/11/2015

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