ग़ज़ल-वो सपनों का सौदागर है-शकुंतला तरार

ग़ज़ल
वो सपनों का सौदागर है
मेरे दिल के जो अन्दर है||

टूट न जाये दिल यह नाज़ुक
जिसमें रहता वो दिलवर है||

रोज़ बनाता नए बहाने
फिर भी मेरा वो रहबर है||

मैं हूँ उसमें वो है मुझमें
इस बात की उसे ख़बर है||

स्वार्थ नहीं “शकुंत” चाहत में
प्यार नहीं होता कहकर है||
शकुंतला तरार रायपुर (छत्तीसगढ़)

3 Comments

  1. Girija Girija 20/11/2015
    • shakuntala tarar 20/11/2015
  2. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 20/11/2015

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