“त ला श”

“त ला श”
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ज़िन्दगी
है एक छलावा, एक धूंद, एक भूलावा
ज़िन्दगी
है, सारी की सारी, एक भटकन
कभी ना ख़त्म होने वाली, एक तलाश
सदियों से मानव जन्म लेता रहा
मृत्यु की गोद में सोता रहा
एक पीढ़ी, अंत के इंतज़ार में
दूसरी पीढ़ी, जन्म के इंतज़ार में
सब कुछ
बस यूहीं चलता रहा, सिर्फ चेहरा बदलता रहा
कब ख़त्म होगी यह तलाश, कब छटेंगे ये कोहरे
कब होंगे फिर सवेरे, कब होगा फिर प्रकाश..?
क्या ?
कभी कुछ बदलेगा, या यूहीं
सारी ज़िन्दगी भटकता रहेगा मानव
हाँ
अब तक की तो, यही है नियति
प्रकृति अभी तक तो,यही है कहती
क्या ?
यही कहानी यूहीं दोहराती रहेगी
पीढियां दर पीढियां यूहीं ख़त्म होती रहेगी

पर, शायद वक्त एक ऐसा भी आयेगा,
पृथ्वी सारा आकाशमय हो जायेगा
तब ???????
और कुछ नहीं, और कुछ नहीं,
बस “शून्य शून्य और शून्य” रह जायेगा
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ललित निरंजन

One Response

  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 20/11/2015

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