||आधुनिकता की हवा ||

“बाह्य आडम्बरों का कैसा देखो
सृजन करती है ये दुनिया
आधुनिकता की बलि-वेदी पर
रिश्तों को खंडित करती ये दुनिया ,

अपनों की क्या बात करे हम
परायों से भी भेद नहीं अब
आया है मौसम आधुनिकता का
लज्जा की तो खैर नहीं अब ,

जो बांह में बांहे डाल दिए तो
जोड़ी वह नंबर वन है
खुलेआम हो यदि चुम्बन तो
आधुनिकता का यह मौसम है ,

मेल – फीमेल का भेद मिट गया
हो गए अब एक दूजे के हम
हो गया अंग प्रदर्शन गहना महिलाओं का
और कपडे से अब खुद को ढकते है हम ,

गालियों का सुन्दर शब्द संयोजन
जब तक ना हो मन में हमारे
टाटा-बाय-बाय करे ना जब तक
कैसे होंगे आधुनिक विचार हमारे ,

बाप हो गया है डेड अब देखो
माँ बन गयी है ममी कहीं
बचा-खुचा जो सम्बोधन था
बन गए उनमे सीस और ब्रो कहीं ||”

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