आबो हवा मेरे चमन की

ये किसने आबो हवा खराब की मेरे चमन की
खिलखिलाते गुलिस्ता अब मुरझाने लगे है !!

कल तक खिजाओ में आया करती थी बहारे
गुलशन में नई कलियाँ अब कुम्हलाने लगे है !!

क्या करे उम्मीद कोई किसी से हिफाज़त की
यंहा तो माली ही अब गुलशन उजाड़ने लगे है !!

पंछियो की कोलाहल, कोयल की कूक नही होती
कैसे चहकते जंगल भी अब बियावान रहने लगे है !!

हम तो वैसे ही खुशमिज़ाज है “धर्म” और तुम भी
फिर क्यों शहर में नफरत के शोले भड़कने लगे है !!

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——-डी. के. निवातियाँ ——-

6 Comments

  1. RAJ KUMAR GUPTA Raj Kumar Gupta 19/11/2015
  2. डी. के. निवातिया dknivatiya 19/11/2015
  3. K K JOSHI K K JOSHI 20/11/2015
    • डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 20/11/2015
    • डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 22/11/2015

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