दर्द

आकाश में फैला
कुहासा घना सा
पर्वतों को ओढ़े
सूरज का ओज थमा
हर वस्तु का प्रतिबिम्ब
लगता धुंधला सा,
वर्षा हुई रूष्ट
निर्जल कोर वसुन्धरा के
निर्जन हैं वन उपवन
पंख लगे तृष्णा के
सावन लगे स्वप्न सा
पुष्प भी ऐसे डाल पर
मानो दीप कोई बुझा सा,
प्रकृति की गोद में
शैशव संवरा जो भूला नहीं
कोयल की कूंके रूठ गयी
सरित में भी श्वेत धार नहीं
चित्त कम्पित शीत सर्द सा
अश्रुओं का अधरों से स्पर्श
लगता कांटों के दर्द सा।

………………… कमल जोशी

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  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 19/11/2015

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