“मै”

मैंने तृप्ति करी भूख की ,
ओढ़ने के लिए लिबाज़ बनाया ,
जब सब समझ ना सका जीवन में ,
मैने ही अंधविश्वास बनाया ||

मैंने ही महसूस किया दर्द को,
मैंने ही तो प्यार बनाया ,
जब सब हासिल न कर सका खुदसे ,
मैंने ही व्यापार बनाया ||

मैंने रचना की शिष्ट समाज की ,
खुदको मकबूल बनाया ,
जब सबपे राज़ न कर सका ,
मैंने ही कानून बनाया ||

मैंने ही बाटा धर्म में लोगो को ,
सबने अपना अलग संवाद बनाया ,
जब खत्म हुई शहिषुणता मेरी ,
मैंने ही आतंकवाद बनाया ||

मैंने ही नापे पैर धरती पे ,
मैंने ही सबको आसमान बताया ,
जब डर खत्म हुआ एक दुसरे का ,
मैंने ही भगवान बनाया ||

6 Comments

  1. Girija Girija 19/11/2015
    • virendra mehta 19/11/2015
      • मीना गोदरे अवनि, 19/11/2015
        • virendra mehta 19/11/2015
  2. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 19/11/2015
    • virendra mehta 19/11/2015

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