आखिरी तमन्ना

आजा ,कि आखिरी तमन्ना है बाकी,
आखिरी जाम को तरस रही साकी।

मौत के नाम पी ,ऐसे सो जाऊँ।
माटी की देह मैं , माटी में खो आऊँ।

ऐसी चिरनिंद्रा हो, होश न फिर आए ,
आजा , कि स्वार्थी दुनिया न भाये।

ऐसी दुनिया जहाँ आत्मा के मरने पर भी , देह विचरते हैं,
जिंदगी जीने के लिए ,हम जहर ही पीते हैं।

आज खुद के ही स्वार्थ के लिए ,खुद को मारा जाता है ,
आत्मा को देह पर ,देह को सिक्कों पर वारा जाता है।

यहां इज्जत ,ईमान , सच्चाई ,सब बेमोल बिकते हैं ,
आज चाँदी के को सिक्कों के ही मोल दिखते हैं।

आजा , कि अब भी मेरी आत्मा है बाकी ,
जल्दी और जल्दी कहीं देर न हो साकी।

आजा ना ,कि मेरा सब कुछ खो जाएगा ,
आत्मा न होगी तो यम क्या ले जाएगा।

फिर मैं सदा को यहाँ, घुटी सी रह जाऊँगी,
बिन आत्मा की देह से ही चीखूँगी ,चिल्लाऊँगी।

आजा ,कि आखिरी तमन्ना है बाकी ,
आखिरी जाम को तरस रही साकी।

2 Comments

  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 19/11/2015
    • Manjusha Manjusha 26/11/2015

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