“दिवाली “

आज भी सच बोलने से कतरा रहा हु ,
अपना स्वार्थ हर जगह जता रहा हु ,
सत्य की असत्य पर जीत का दिया जल लिया मैंने लेकिन ,
शायद आज तक समझा नहीं लेकिन इस साल फिर दिवाली मना रहा हु ||

अपने रिश्तो का गला अपने हाथो से दबा रहा हु ,
अपने कर्तव्यों को छोड़ अधर मैं खुद से दूर भाग रहा हु ,
इन फटाको के शोर में मानवता दफना दी मैंने ,
शायद आज तक समझा नहीं लेकिन इस साल फिर दिवाली मना रहा हु ||

अपने एहम में डूब चूका हु ,
उसूलो की बलि दी मैं ईमान लेके सरेआम बिक चूका हु ,
इन नए नए कपड़ो के बीच पुरानी मुस्कान खो दी है मैंने ,
शायद आज तक समझा नहीं लेकिन इस साल फिर दिवाली मना रहा हु ||

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