मुसाफिर का सफर

नज़रे झुकाये बैठे हो अश्क बहे जाते हैं
बडी भोली हो तुम क्या ऐसे भी गम छुपाते हैं
क्या खफा हो मुझसे जो दामन बचाये बैठे हो
गर खफा हो जमानें से तो क्यों फांसले बढाये बैठे हो
RKV(MUSAFIR)
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