बैसाखी

सब कुछ छूट गया

वह टूटी छत

वे फूटे बर्तन

वो भीगी दीवारें

वो कराहते सिसकते चेहरे

किसी अपाहिज को देखकर

दया का उमडना

अब कुछ भी नहीं रहा मेरे पास

क्योंकि

 मैं बदल गया हूं अब

एकाकी खुद अपनी

लाश को ढोने का दंभ भरते भरते

न मालूम कब

खुद बैसाखी के सहारे चलने लगा

और अब एक कदम भी नहीं चल सकता

इनके बगैर

ठीक भी तो है

तभी तो मुझे अब

आहें नहीं सुनाई पडती

रोना नहीं दिखता

अब सुनता हूं बस

चीखने की आवाजें

और देखता हूं

खुद में घुटने का अहसास लिए

जीने की चेष्ठा।

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