ग़ज़ल-“देखिये साल नया आया है”शकुंतला तरार

“साल नया आया है”
गुलशने ज़ीस्त को महकाया है
”देखिये साल नया आया है”||

मन के नभ पर है मसर्रत की छटा
ज़िंदगानी पे नशा छाया है ||

फ़र्श पर पांव मेरे टिकते नहीं
दौर ख़ुशियों का चला आया है ||

हमने पाई है जहाँ की दौलत
हौसला क़ल्ब का सरमाया है ||

लोग आतंक से त्रस्त ”शकुंत’’
सर पे क्या नक्सली भय छाया है ||
शकुंतला तरार रायपुर (छत्तीसगढ़)

Leave a Reply