ग़ज़ल- बेटियाँ- शकुंतला तरार

बेटियां
घर के चमन को खूब सजाती हैं बेटियां
दिल मे ख़ुशी के दीप जलाती हैं बेटियां ||

बेटी का जन्म होता है माँ बाप के लिए
खुद अपनी अस्मिता क्यूँ मिटाती हैं बेटियां ||

शोभायमान उनसे हैं दायित्व के दीये
कुल की परम्परा को निभाती हैं बेटियां ||

है उनकी मेहनतों का कोई मोल ही नहीं
दिन रात फिर तो पिटती ही जाती हैं बेटियां ||

कर्मों के आइनों में वो आदर्शवान हैं
क्यूँ अपनी ये पहचान गंवाती हैं बेटियां ||

वक़्त आने पे हमने यही देखा है ऐ ”शकुंत”
अश्कों से दिलकी आग बुझाती है बेटियाँ
शकुंतला तरार रायपुर (छत्तीसगढ़)

2 Comments

  1. RAJ KUMAR GUPTA Raj Kumar Gupta 17/11/2015
  2. Shishir "Madhukar" Shishir 17/11/2015

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