कब सावन आवे

धूप सुनहरी चलती रहती,
वक्त का दामन थामे |
पर्वत नदियाँ सब सहमे से,
कहते है कब सावन आवे ||
पतझड़ छाया है मन में,
मुस्कान भी धूमिल होती जाती |
जर्जर लम्हे होकर घायल,
कहते है कब सावन आवे ||
एक बूँद पड़ी जब मिटटी पर,
उड़ी महक इस दिल तक |
पल में जीवन झूम उडा,
रहा न ख़ामोशी का पहरा ||
अब रिमझिम वारिश,
धूमिल पत्तो को नहला कर |
पर्वत को सहला कर,
चली झूमती इस दिल को बहला कर ||

रचयता सोनिका मिश्रा

2 Comments

  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 17/11/2015
  2. omendra.shukla omendra.shukla 17/11/2015

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