कैसे भूलूँ तेरी मोहब्बत को (ग़ज़ल)

तेरी खता को खता कहूँ तो
मोहब्बत बदनाम होती है
हसरतें दिल की तमाम पूरी होती नहीं
कुछ कोशिशे नाकाम होती हैं

इतना खुशनसीब कौन है ज़माने में
जिसका दिल कभी टूटा नहीं
आखें रोक नहीं सकी दर्द ऐ दिल
यहाँ तो रुस्वाई सरे आम होती है

वो चाहे या न चाहे ये फैसला
उनका ही होता था मुझ पर
मेरे दिल ने ख़ुशी इज़हार किया
जब उनकी नज़रें मेहरबान होती है

यूँ ही नहीं तम्मनाओ के फूल
खिलते हैं दिल में हरपल
मुरझाये फूलों से पूछो
नहीं हर बार कली जवान होती है

दिल में उनकी चाहत का ये आलम है
कि बेवफाई भी हमसफ़र लगती है
रोक लेता हूँ आंसू आँखों में
नहीं तो ये मोहब्बत बदनाम होती है

भूलने की कोशिश कर रहा हूँ उनको
मगर कैसे भूलूँगा ये सोचता हूँ
दिल में हसरत कुछ इस तरह परवान है
कि उनकी यादों से मुलाकात सुबह-शाम होती है

हितेश कुमार शर्मा

One Response

  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 17/11/2015

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