“अनुभूति”

“अनुभूति”
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एकाँत के एक छँड़ में
ज़िन्दगी के हर बीते पल की ओर
आज सहसा ही धयान खीँच जाता है
और तभी होती है एक “अनुभूति..!
क्या हमने हर पल की गलती ही गलती…..?

बीत गई सारी ज़िन्दगी, यूहीँ जोड़ तोड़ मेँ
क्या बोया कया सीँचा, क्या खोया क्या पाया
कुछ भी ना तो साथ जाएगा
बँद मुठ्ठी आया था, खाली हाथ जाउँगा….!

बिदिम्बना की मनःस्थिति मेँ, अंतर्मन की द्वंद मेँ
तभी एक ढी्ढ़ निशचय करते हैँ
जीवन को पुनः तलाशने की, जीवन को पुनः समझने की,,,,,,,!

और तब होती है एक नई “अनुभूति”….?
सद कार्य ही शायद, सही कर्म है जिनदगी का

एक ढी्ढ़ निशचय करते हैँ,
अब आने वाला हर पल बीतेगा सद कार्य में ही…….?

पर
नियति को तो और ही कुछ मँजूर था
बीत गई सारी ज़िन्दगी, यूहीँ तलाश मॆँ

ओर
स्वॅम, को हम पाते हैँ, ज़िन्दगी के अँतिम पल मेँ
तब तक, हर पल कुछ भी करने का चुका था बीत

पुनः होती है एक अतिँम, अनुभूति…!
काश………..!
आयी होती सही समय पर वह सारी की सारी अनुभूति…………?
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ललित निरंजन

4 Comments

  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 17/11/2015
    • asma khan asma khan 17/11/2015

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