||ईच्छा ||

“ना होते है साकार कभी
क्यूँ सपने अपने जीवन के
रह जाते है अधूरे हर किस्से
बंध शब्दों के उलझन में ,

झंझावातों से यह भरा जीवन
वेदनाओं को सहता फिरता
गिर-गिर उठता हर फलक पे
पर उठके फिर कभी ना गिरता ,

समेटे असीम बुराईयाँ खुद में
ढूंढता अच्छाईयां को दूसरों में
हैं दशा है अपनी फिर भी
रचता है ढोंग बहानों में ,

जीवन के कण्टक वीरानों में
परिवर्तन की आस लगाये रखता
है मंजिल करीब ही अब
कुछ ऐसी ढांढस बंधाये रखता ,

हार-जीत की फिकर ना करता
और जीत की आस लगाये रखता
है नहीं यह अंतिम अवसर देखों
साहस का वह ऐसे दम है भरता ,

श्रेष्ठ हु मै कुछ लोगो से
पर श्रेष्ठ और भी मुझे है होना
जीवन के अंतिम पायदानों तक
है इसको ऐसे ही जीना ,

रख हर कदम पे एक नया लक्ष्य
प्राप्ति को उसके उत्सुक होना
खोना सफलताओं के सागर में
और असफलताओं से फिर विचलित होना ,

ना आदि है मेरा कोई
ना अंतहीन मै कहलाता हु
राहु सीमाओं में तो सुख हु
वरना हर पल दुःख मै लाता हु||”