||जलेबी की दुकान ||

“निकल पड़ा मै आज
जलेबी की दुकान पर
लम्बी भीड़ लगी थी लोगो की
पकवानों की उस दुकान पर ,

सहसा दिखा एक बालक मुझको
था लिपटा जो जीर्ण परिधानों में
रुहासे सी चेहरे पे
ममता का अभाव झलक रहा ,

हाव-भाव में भरी थी वेदना
क्षुधायुक्त वह तड़प रहा
उम्मीद लगाये चन्द टुकड़ों की
वह इधर-उधर भटक रहा ,

कर आत्मसात स्वस्वाभिमान को
अनुकरण से दूर वह ठहर रहा
थे मशगूल सब आनन्दों में
लुत्फ़ उठा रहे जलेबी का ,

ना परवाह किसीको उसकी
ना खुशियों से उसके लेना-देना
है मूल्यवान क्षुधातृप्ति खुद की
क्यूँ अवसर दूसरों को देना ,

सहसा छलक पड़ा निवाला एक
परोसे उन जलेबी के तस्तरियों से
हो उठा मन उसका प्रफुल्लित
भर आया दिल फिर खुशियों से,

सहसा झपट पड़ा वह
ज़मीन पे पड़े उस निवाले पे
उठा उन्हें फिर हाथों में
चल निकला वह घर की ओर,

थी तसल्ली अब उसके दिल को
ना भूखा रहेगा आज अनुज उसका
बरस पड़े थे अश्रु खुशियों के
सहज ही भीगी आखों से उसके ||”

2 Comments

  1. surya prasad maurya 16/11/2015
  2. omendra.shukla omendra.shukla 16/11/2015

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