धूप के सिक्के

धूप के सिक्के
बंटोर रही चिडि़या सुनहरी
चहुंओर फैल रही
सुखद शीतल हवाऐं
घूम रहे भंवरे भरी दुपहरी,
अम्बर के आवरण में
उठते गिरते हर क्षण
झर झर झरते झरने की
निश्छल रेखाओं का आस्तित्व
सुदूर फैला रेत का सागर
खोज रहा भावों का अपनत्व
सूरज की हर किरण
गा रही मधुर संगीत
जीवन का राग अति सुन्दर
कांटे भी यहां
फूलों की रक्षा को तत्पर,
दीर्धकाय देवदारों की
ऊंची टहनियों की उलझन में
सफेद बर्फ ने पाया विश्राम
सूर्य के विस्फोटों के मध्य
अद्भुत जीवित रहने का संग्राम।

………………… कमल जोशी

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