झुरमुट और झरोंखे।कविता।

झुरमुट और झरोंखे । कविता।

ढलती शाम
अलसाया सूरज
सन्नाटो से दूर
वही विम्ब, प्रतिबिम्ब
झुरमुट से नही झांकते
चाँद नही, तुम
झांकती है शहर की खिड़की
शायद तुम ? या तेरे साथ ?
रूप तुम्हारा
पुनः बन्द हो ही जाती है
हृदय से वाष्पित होकर
स्नेह की दो बूँद
झुरमुट और झरोंखे खिड़कियों के
अब नही बनते
सतरंगी इंद्रधनुष
मेरे लिए
मेरी आँखों के लिए

..राम केश मिश्र।

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