अंतिम यात्रा

मायावी नगरी का स्वप्न है
उड़ते पंछियों की ध्वनियों में
मिश्रित अनेकों संवेदनाऐं
लक्ष्य का विकल्प क्यों
कल्पनाओं के चित्रों को
जीवन के चलचित्र में उकेरना
आशाओं कें कालान्तर से ही
समस्त वर्जनाओं को तोड़ कर
अंकुरित होते रहे हैं बीज
सूखी मिट्टी के मैदानों में
सूरज की लाल पीली किरणों का
मध्धम् सा आवरण हुआ
हुआ सुबह का भी शाम का
कितने प्रभावी यह यायावार
बांध दें जो अन्तर्मन की
भूमिकाओं को सिलसिलेवार
हिमालय का नग्न क्षितिज
अतिक्रमण करता कल्पनाओं का
जीवन के बहुमुखी चिन्तन में
श्वेत श्याम स्मृतियों के मध्य
मन कभी हंसता कभी रोता
और सांसारिक जिज्ञासाओं के
अपनेपन की सीमारेखा पर
भटकते भटकते खोजता
अंतिम यात्रा के कुछ शब्द।

………………… कमल जोशी

One Response

  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 15/11/2015

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