प्रतिबिम्ब

बैठा हूँ मै सामने ,
एक जलते हुए दिए के |
ह्रदय में उठ रहा है ,
बस एक ही प्रश्न ?
ये दिया है या मैं ही हूँ ,
या है मेरा अपना ही प्रतिबिम्ब |
जो जल रहा है निरंतर ,
कुछ कहे बिना किसी से |
लपटों की लालिमा है ,
ह्रदय का लहू जैसे |
जलती हुयी बाती ,
तस्वीर है विरह की |
किन्तु –
स्वयं को जला कर भी ,
ये शांत है , प्रशांत है |
समेटे हुए स्वयं में ,
अथाह दर्द का सागर ;
बिलख रहा निरंतर ,
ओढ़े प्रसन्नता की चादर |
शायद इसी तरह से ,
मैं भी जल रहा हूँ ;
सुकून की तलाश में ,
दर-दर भटक रहा हूँ

सुकून की तलाश में ,
दर-दर भटक रहा हूँ ||

2 Comments

  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 15/11/2015
  2. Shishir "Madhukar" Shishir 15/11/2015

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