!”शून्य”!

!”शून्य”!

ब्रहमांड ही शून्य है
अनन्त ही शून्य है,
शून्यता भी तो शून्य है
सम्पूर्णता भी तो शून्य ही है I
! बिंदु !
हाँ है बिंदु सूक्ष्मतम आकार पदार्थ का
मिलाकर ही इन अनगिनत बिन्दुओं को
होता है निर्माण
रेखाओं का
मिलाकर इन अनगिनत रेखाओं को,
होता है निर्माण
पदार्थों का
सूक्षतम रूप है अणु, पदार्थ का
बिम्ब प्रतिबिम्ब हैं
अणु, बिंदु
होते रहते हैं जो प्रवाहित अनन्त में
अनन्त ही तो आखिरतः शून्य है
कहते हैं
योगी और ज्ञानी, दुनियां है फानी
अंतर्धयान लगाकर मन की आँखों से
करोगे जब तलाश ईश्वर की
प्रथम दृश्य आकाशमय सा दिखेगा
प्रवाहित होती रहती हैं तरंगे इनसे
है तत्पशात,
अनन्त प्रकाश, केवल प्रकाश
अंततः समाधिस्त अवस्था में
रह जाता है साथ
आकाशरुपी ब्रहमांड, आकाशरुपी ब्रहमांड
यह ब्रहमांड ही तो
शून्य है, शून्य है, शून्य है
कहते है हम “सत्यम, शिवम्, सुन्दरम”
शिव ही सत्य है, शिव ही सुंदर ह
जीवन, शिव से ही आता है
अंततः शिव में ही समा जाता है
शिव ही सम्पूर्णता का द्योतक है
सम्पूर्णता ही शून्य है
हाँ
जीवन भी तो आखिर
शून्य ही है, शून्य ही है, शून्य ही है I

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ललित निरंजन

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