बाल दिवस विशेष।किताबें खोल जो बैठे ।कविता ।

।कविता। किताबें खोल जो बैठे ।
(बाल दिवस विशेष)

इन्हीं ख़ामोश रातों में
कितांबे खोल जो बैठे ।
उन्हीं की जीत होती है
लिये सब पोल जो बैठे ।।

उन्हें न जीत की चिंता
उन्हें न हार से बचना ।
उन्हें हर जय पराजय से
नया इतिहास है रचना ।।
उन्हें भी नींद आती है
मगर उम्मीद होती है
दुनियां वे बसायेंगे
अभी बेमोल जो बैठे ।
इन्हीं ख़ामोश रातों में
कितांबे खोल जो बैठे ।

पढ़ना शौक है उनका
लिखना ख्वाब है उनका
किताबे प्यार है उनका
वही इक ज्वाब है उनका
सभी की आस है उनपर
उन्हें विश्वास है खुदपर
अपने देश के खातिर
स्वम को तोल जो बैठे ।
इन्हीं ख़ामोश रातों में
कितांबे खोल जो बैठे ।।

अकेला एक सूरज है
अकेला चन्द्रमा उगता
कोई दिन में नही सोता
कोई है रात भर जगता
इनका तर्क है मालुम
उन्हें हर फर्क है मालुम
तभी वे जान पाये कि
पृथ्वी गोल, जो बैठे ।
इन्हीं ख़ामोश रातों में
कितांबे खोल जो बैठे ।।

नही उस सर्द की ठंडक
नही वो गर्म के शोले
कभी न रोक पाये है
बरसती बूँद से ओले
कभी कुहरा ,कभी रिमझिम
कभी है रोशनी टिमटिम
इन्हीं मौसम के साथी वे
खुदी को घोल जो बैठे ।
इन्हीं ख़ामोश रातों में
कितांबे खोल जो बैठे ।।

उन्ही के स्वर्ण से अक्षर
उन्ही को ज्ञान होता है
उन्हें सब याद हो फिर भी
नही अभिमान होता है
वही प्रमाण देते है
नया निर्माण देते है
देखा चुप सभी है तो
अचानक बोल जो बैठे ।
इन्हीं ख़ामोश रातों में
कितांबे खोल जो बैठे ।।

उन्हें गुस्सा नही आता
कभी नफरत नही करते
समय के साथ चलते जो
कभी आहें नही भरते
उन्हें सत्कार की आदत
उन्हें है प्यार की आदत
एकाकी है, अकेले पर
समझकर होल जो बैठे ।
इन्हीं ख़ामोश रातों में
कितांबे खोल जो बैठे ।।

सुबह से शाम तक केवल
स्वम को जो सुधारेंगे
वही बनकर मशीहा इक
दिन दुनियां को निख़ारेगे
नही जो बात से डरते
नही हालात से डरते
दुश्मन के लिये बनकर
कोई भूडोल जो बैठे ।
इन्हीं ख़ामोश रातों में
कितांबे खोल जो बैठे ।।

उन्होंने मैथ इंग्लिश के
नियम सब याद कर डाले
साइंस में भूगोलो में
सीमा पार कर डाले
उन्हें प्रोजेक्ट है प्यारा
सभी सब्जेक्ट है प्यारा
वेदों को पुराणों को
हृदय में घोल जो बैठे ।
इन्हीं ख़ामोश रातों में
कितांबे खोल जो बैठे ।।

विद्यालय को समझकर जो
चले है ज्ञान का मन्दिर
गुरु हैं ज्ञान का दर्पण
वही विज्ञान का मन्दिर
वही विद्यार्थी सच में
वही शिक्षार्थी सच में
आपने देश के खातिर
अर्पण शोल कर बैठे ।
इन्हीं ख़ामोश रातों में
कितांबे खोल जो बैठे ।।

तुम भी एक हीरा हो
जिसे रब ने बनाया है
मगर तुमने समझ रखा
इसे मिटटी की काया है
तुम्हे अभ्यास है करना
सफल प्रयास है करना
“मिश्रा जी” के ख़ातिर है
बड़े अनमोल जो बैठे ।
इन्हीं ख़ामोश रातों में
कितांबे खोल जो बैठे ।।

……….राम केश मिश्र

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